Shopping cart

Subtotal: $4398.00

View cart Checkout

Magazines cover a wide subjects, including not limited to fashion, lifestyle, health, politics, business, Entertainment, sports, science,

राज्य

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन, दिशोम गुरु ने 81 वर्ष की आयु में दुनिया को कहा अलविदा

Blog Image
901 0

रांची/दिल्ली – झारखंड की राजनीति के पुरोधा और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक शिबू सोरेन का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे। सोमवार सुबह दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता के निधन की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) पर साझा की।

शिबू सोरेन पिछले एक महीने से अधिक समय से दिल्ली के अस्पताल में भर्ती थे। जून के अंतिम सप्ताह में उन्हें किडनी संबंधी समस्याओं और स्ट्रोक की शिकायत के बाद ICU में भर्ती किया गया था। वह एक महीने से ज्यादा समय से लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

अस्पताल द्वारा जारी मेडिकल बुलेटिन के अनुसार, उन्हें सोमवार सुबह 8:56 बजे मृत घोषित किया गया।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बोले, "आज मैं शून्य हो गया हूं"

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक्स पर लिखा,
“आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं...”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिबू सोरेन के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया और इस कठिन घड़ी में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से फोन पर बात की।


तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे

शिबू सोरेन झारखंड राज्य के गठन से लेकर उसकी राजनीति की धुरी बने रहे।

  • पहली बार 2 मार्च 2005 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली लेकिन 12 मार्च को बहुमत न साबित कर पाने के कारण इस्तीफा देना पड़ा।

  • दूसरी बार 27 अगस्त 2008 से 19 जनवरी 2009 तक मुख्यमंत्री रहे।

  • तीसरी बार 30 दिसंबर 2009 से 1 जून 2010 तक झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे।


लोकसभा व राज्यसभा में भी रहा प्रभाव

  • 8 बार लोकसभा सांसद चुने गए।

  • 3 बार राज्यसभा सदस्य भी रहे।

  • उन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


आदिवासी राजनीति के प्रतीक

शिबू सोरेन को झारखंड में “दिशोम गुरु” यानी “देश का गुरु” कहा जाता था। उन्होंने झारखंड राज्य के गठन और आदिवासी अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। 1980 के दशक से वे झामुमो के जरिए आदिवासी आवाज को राजनीतिक मंच देते रहे। झारखंड की पहचान और अस्मिता की राजनीति में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Post