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दिल्ली

दिग्गज मैराथन धावक श्रद्धेय फौजा सिंह का निधन: 114 वर्ष की आयु में भी जिनकी जोश और फिटनेस ने सभी को प्रेरित किया

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नई दिल्ली। विश्वप्रसिद्ध मैराथन धावक और फिटनेस की जीवंत मिसाल श्रद्धेय फौजा सिंह जी के निधन का समाचार देश और दुनिया के खेल प्रेमियों के लिए गहरे दुख का कारण बन गया है। 114 वर्ष की आयु में भी सक्रिय और अनुशासित जीवनशैली जीने वाले फौजा सिंह ने यह साबित किया कि उम्र केवल एक संख्या है।

खेल नहीं, जीवन का प्रेरक बने फौजा सिंह

फौजा सिंह सिर्फ एक धावक नहीं थे, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन, आत्मबल और स्वास्थ्य के प्रतीक थे। उनका जीवन तमाम युवाओं और बुज़ुर्गों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहा। 100 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैराथन में हिस्सा लिया और दौड़ पूरी की, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

उनकी सबसे चर्चित पहचान बनी जब वर्ष 2011 में उन्होंने टोरंटो वाटरफ्रंट मैराथन में 100 वर्ष की उम्र में रेस पूरी की और दुनिया के सामने 'सदी के धावक' के रूप में उभरे।

भारत और सिख समुदाय के लिए गौरव

पंजाब के जलाल गांव में जन्मे फौजा सिंह ने कठिन परिस्थितियों में जीवन की शुरुआत की, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनका आत्मबल और बढ़ा। प्रवासी भारतीय समुदाय और विशेषकर सिख समुदाय के लिए वे गौरव का विषय थे। उन्हें ‘टर्बन टॉरनेडो’ के नाम से जाना जाता था। उनकी ऊर्जा और जीवटता ने उन्हें एक जीवित किंवदंती बना दिया था।

सामाजिक संदेशों से भी जुड़े रहे

फौजा सिंह फिटनेस के साथ-साथ सामाजिक संदेशों से भी जुड़े रहे। उन्होंने नस्लभेद, असहिष्णुता और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली के खिलाफ मुखर होकर प्रचार किया। वे कई अंतरराष्ट्रीय हेल्थ कैंपेन का चेहरा भी रहे।

नेताओं और खेल जगत ने दी श्रद्धांजलि

उनके निधन पर देश के तमाम नेताओं, खिलाड़ियों और आम नागरिकों ने शोक व्यक्त किया है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा –

"दिग्गज मैराथन धावक श्रद्धेय फौजा सिंह जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। 114 वर्ष की आयु में भी सक्रिय और सेहत के लिए सतर्क रहने वाले फौजा जी को दुनिया फिटनेस के प्रतीक के रूप में जानती थी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे और परिजनों व प्रशंसकों को संबल प्रदान करें।"

विरासत: फिटनेस के लिए जीवन समर्पित

फौजा सिंह ने अपने जीवन में जो विरासत छोड़ी, वह सिर्फ रनों में नहीं, बल्कि एक स्वस्थ, अनुशासित और जुझारू जीवन की प्रेरणा में है। वे हमेशा यह संदेश देते रहे कि "अगर शरीर साथ दे तो उम्र कोई मायने नहीं रखती।"

उनके जाने से एक युग का अंत हुआ है, लेकिन उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को जीवनभर प्रेरित करती रहेगी।

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