टोक्यो।
जापान की राजनीति में एक बड़ा मोड़ देखने को मिला है। प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और उसके सहयोगी दल ने ऊपरी सदन (हाउस ऑफ काउंसलर्स) में अपना बहुमत खो दिया है। यह चुनावी नतीजे इशिबा सरकार के लिए एक करारा झटका माने जा रहे हैं, जो पहले से ही कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रही है।
हालांकि बहुमत खोने के बावजूद, प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से देश की सेवा जारी रखेंगे।
क्या हुआ ऊपरी सदन में?
जापान के द्विसदनीय संसद प्रणाली में ऊपरी सदन की भूमिका सलाहकार की होती है, लेकिन यहां की राजनीतिक शक्ति संतुलन में इसका महत्वपूर्ण प्रभाव है। ताजा परिणामों में LDP और उसके मुख्य सहयोगी कोमेटो पार्टी को कई सीटों का नुकसान हुआ है, जिससे वे बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गए।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह परिणाम जनता में बढ़ती महंगाई, आर्थिक असमानता, और हाल के नीतिगत फैसलों से असंतोष का संकेत है।
प्रधानमंत्री का रुख साफ: "इस्तीफा नहीं दूंगा"
मतगणना पूरी होने के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री इशिबा ने कहा:
"हम जनता के फैसले का सम्मान करते हैं। यह हमारे लिए आत्ममंथन का समय है, लेकिन मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दूंगा। हमारी प्राथमिकता स्थिर सरकार देना और लंबित सुधारों को पूरा करना है।"
उन्होंने आगे कहा कि उनकी सरकार विपक्षी दलों के साथ सहमति बनाकर कानून पारित कराने की दिशा में काम करेगी।
राजनीतिक असर और आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिणाम आने वाले समय में इशिबा सरकार की नीतियों के कार्यान्वयन में अड़चन पैदा कर सकता है। विपक्षी दल अब संसद में सरकार के खिलाफ अधिक प्रभावी ढंग से आवाज उठा सकते हैं।
यह चुनाव परिणाम देश की आर्थिक नीतियों, डिफेंस बजट, और संवैधानिक संशोधनों को लेकर चल रही बहसों पर भी प्रभाव डालेगा।