इंदौर। भारत जैसे विकासशील देश में जहां आज जीनोमिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे अत्याधुनिक विषयों पर चर्चा हो रही है, वहीं बच्चों की बीमारी, विकलांगता और मृत्यु के पीछे अब भी सबसे बड़ा कारण संक्रमण और संक्रामक रोग बने हुए हैं। यह विचार इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) के ID चैप्टर द्वारा आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस ‘IDCON’ में देशभर से आए विशेषज्ञों ने साझा किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं डॉ. नीलम मोहन ने कहा कि मध्यप्रदेश में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर भारत में सबसे ज्यादा है, जो चिंता का विषय है। यहां प्रति 1,000 नवजातों में से 56 बच्चों की मृत्यु हो रही है, जबकि राष्ट्रीय औसत 37 है।
संक्रमण सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों ने बताया कि निमोनिया, डायरिया और सेप्सिस जैसे संक्रमण अब भी बच्चों की मौत के 35-45% मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। इससे निपटने के लिए आधुनिक तकनीकों से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करना जरूरी है।
कोविड के बाद टीकाकरण में आई गिरावट
नेशनल चेयरपर्सन डॉ. भास्कर शेनॉय ने कहा कि कोविड-19 के दौरान लाखों बच्चों को टीके नहीं लग पाए, जिससे खसरा जैसी बीमारियां फिर से उभर रही हैं। उन्होंने माता-पिता और डॉक्टरों को आगाह किया कि बच्चों का समय पर टीकाकरण जरूरी है, वरना निमोनिया, मस्तिष्क ज्वर, दृष्टिहीनता और मूत्र संक्रमण जानलेवा हो सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी
ऑर्गेनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ. केके अरोरा ने कहा कि हर 1.5 लाख बच्चों पर केवल एक बाल रोग विशेषज्ञ है। उन्होंने कहा कि इंदौर और भोपाल जैसे शहरी क्षेत्रों में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन ग्रामीण भारत अब भी बहुत पीछे है।
IDCON 2025 की मुख्य बातें:
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हर बच्चे को जीवन रक्षक टीकों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
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घरों और मोहल्लों में सफाई और मच्छर नियंत्रण के लिए जनजागरूकता फैलाई जाए।
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एंटीबायोटिक से पहले संक्रमण की सही पहचान और डायग्नोसिस पर जोर दिया जाए।
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गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग और परामर्श को अनिवार्य किया जाए।
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हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।